सिनेमाई समाज
इस मुल्क में अब किसी भी बात की सार्थकता तब तक साबित नहीं होती , जब तक उसके ऊपर कोई फ़िल्म ना बने, हाल ही में नीरज चोपड़ा द्वारा ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतने के बाद सोशल मीडिया पे चर्चा शुरु हो गई कि उनके बायोपिक में उनका किरदार कौन निभाएगा। कई फिल्मकारों को इसमें व्यवसाय भी दिख ही रहा होगा। व्यवसाय का अवसर तो शुरू से ही बाज़ार का हिस्सा रहा है, परन्तु आधुनिकता ने बाज़ार और समाज के बीच के अंतर को ही ख़त्म कर दिया। हम अपनी चेतना से चल तो रहे है, लेकिन उसे दिशा बाज़ार दे रहा है। अब प्रसिद्धि भी एक price tag के साथ आती है। अब हम नायकों को बस पर्दे पे ही देखना चाहते है। प्रेरणा हमे सिनेमा घरों में popcorn के साथ ही अच्छा लगता है। दो चार गाने और प्रेम प्रसंग के बिना मेहनत फीकी लगेगी ऐसा फिल्मकार मानते है। सच्चे नायक तो पहले कितबों में होते थे ना। मुझे आज भी याद है बिहार बोर्ड के हिंदी पुस्तक में मनोज वाजपाई के बारे में पढ़ा था, जहां से पहली बार उन्हे जाना था, उसमे सकारात्मता थी। जिसने कलाकार शब्द को समझाया था, और समझ ने विचार को जन्म दिया, ना कि फैन बनने को विवश किया ताकि हम उनकी अंधभक्त...